अल्मोड़ा ब्यूरो । मामूली विवाद में कत्ल कर दी गई 66 वर्षीय तुलसी देवी की जिंदगी दुखों और संघर्षों की एक लंबी दास्तान थी। ससुराल से मिला सन्नाटा और चार दशकों तक मायके में बूढ़ी मां का सहारा बनकर काटी गई जिंदगी का अंत इतना खौफनाक होगा यह किसी ने नहीं सोचा था। 95 साल की लाचार मां के सामने जब उनकी बेगुनाह बेटी तड़प-तड़प कर दम तोड़ रही थी, तो गांव में पुरुषों का न होना इस गरीब परिवार के लिए सबसे बड़ा अभिशाप बन गया।ग्राम सभा बसई के रतखेत तोक में शनिवार को हुई तुलसी देवी की हत्या सिर्फ एक अपराध नहीं बल्कि एक बेहद सीधे और संघर्षशील जीवन का दुखद अंत है। मूल रूप से नैहलगैर ग्राम सभा घुगती (देघाट) की रहने वाली तुलसी देवी की शादी मोहन चंद्र से हुई थी लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। कोई संतान न होने के कारण पति ने दूसरा विवाह कर लिया। इस धोखे और दर्द से आहत होकर तुलसी ने हमेशा के लिए ससुराल छोड़ दिया और लगभग 40 साल पहले अपने मायके रतखेत लौट आईं।
