उत्तराखंड में सहस्त्रधारा का नाम न सिर्फ प्रमुख पर्यटन स्थल में शामिल है, बल्कि इसकी विशेष भू-संरचना और भी महत्वपूर्ण है। यहां की चूना पत्थर की गुफाओं में हजारों वर्ष पुरानी जलवायु के राज छिपे हैं। इस महत्ता को देखते हुए वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान ने सहस्त्रधारा को भू-विरासत (जियो-हेरिटेज) का दर्जा दिया है। ताकि सहस्रधारा में चूना पत्थर गुफाओं का संरक्षण किया जा सके।
इसके प्रति जनता को जागरूक करने के लिए वाडिया संस्थान ने रविवार को सहस्रधारा में अभियान भी चलाएगा। इस अभियान के संयोजक वरिष्ठ विज्ञानी डा नरेंद्र मीणा के मुताबिक, जिस क्षेत्र में चूना पत्थर होने के साथ वर्षा अधिक होती है, वहां गुफा निक्षेप यानी चूने की गुफाएं बन जाती हैं।
साथ ही इनमें से पानी रिसकर अलग-अलग जगह से धारा के रूप में निकलने लगता है। इसी कारण हजार धारा के मुताबिक यहां का नाम सहस्त्रधारा पड़ा है। गुफाओं में चूने के रूप में जमाव को सपेलोथेम्स कहा जाता है और यह परत दर परत (लामीना) बढ़ते रहते हैं। प्रत्येक लामीना एक वर्ष के जमाव को इंगित करती है। इसे पूरा जलवायु (पूर्व की जलवायु) के विश्वसनीय संकेतक के रूप में जाना जाता है।
इसके आक्सीजन के आइसोटोप्स का अध्ययन कर पूर्व की जलवायु जैसे मानसून की स्थिति या सूखे की स्थिति आदि का आकलन किया जा सकता है। इससे भी सहस्रधारा की भौगोलिक संरचना को सुरक्षित रखना जरूरी है। इस क्षेत्र में भू-विरासत घोषित कर संरक्षण के कार्य को आसान बनाया जा सकेगा।
6.5 लाख वर्ष तक हो सकता है सपेलोथेम्स का जमाव
वाडिया संस्थान के वरिष्ठ विज्ञानी डा मीणा के मुताबिक, चूना पत्थर गुफाओं में सपेलोथेम्स का जमाव 6.5 लाख वर्ष तक हो सकता है। यानी 6.5 लाख वर्ष पहले तक कि जलवायु की स्थिति पता लगाई जा सकती है।
